जिस जाति/समाज को गुलाम बनाना हो उसके इतिहास को नष्ट कर दो और जिस देश को गुलाम बनाना हो तो उसकी संस्कृति को नष्ट कर दो। मिलिट्री (प्रशक्षिति सिपाही) के बगैर युद्ध और मशिनरी (प्रशक्षिति कार्यकर्ता) के बिना चुनाव लड़ ही नहीं सकते! जितना तो दूर!


1. आप जानना होगा कि भारत की प्राचीनतम् नाम ‘निषाद’ है, देश की प्राचीन संस्कृति ‘निषाद संस्कृति’ हैं। प्राचीनकाल (2000वर्ष पहले) में निषाद/कोल/भील यानि आपके वंशज का सत्ता/राज था। उस समय दुनिया में 3रू में 1रू आपके भारत का चलता था, दुनिया में सहायता करते थे। तब भारत को सोने की चिडि़या कही जाती थी। ‘निषाद’ जाति नहीं है बल्कि चारों वर्ण से अलग ’पंचम् वर्ण’ है। महर्षि बाल्मीकि, महर्षि वेद व्यास, प्रहलाद, रामसखा महाराज श्री गुह्यराज निषाद, निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र अभिद्युम्न (अभय) या एकलव्य, माता सत्यवती, नल निषाद, महाराजा सिंघानु निषाद, महारानी दमयन्ति, महारानी रासमणी, राय साहब रामचरण निषाद, मा. जमुना निषाद, मा. फूलन निषाद आदि ने इस वशं को सुशोभित किया है। (साभार- वैदिक एवं ब्राहमणी धर्म डा. श्री कान्त पाठक, जस्टीस आफ इण्डिया, डा. अमत्र्य सेन, प्रचीन भारत का इतिहास डा. के सी श्रीवास्तव)

हम लोग इलाहाबाद श्रृगवेर पुर धाम/किले के (श्रीराम के आत्म बालसखा) महाराज श्री गुह्यराज निषाद, निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र अभिद्युम्न (अभय) या एकलव्य के वशंज है। वाल्मिकि रामायण मे वर्णित राम के आत्मसखा महाराजा गुह्यराज निषाद का किला इलाहाबाद/श्रृगवेरपुर मेे पुरातत्व विभाग के खुदाई से मिले घ्ंवसावशेष से प्रमाणित है कि निषादो का विशाल राज्य था।

 

आप जानते है कि निषादों का गौरवषाली इतिहास रहा है। आर्यो, शक, यवन, हुण, मुगल अन्त में अंग्रेज आब्रजक आक्रमणकारियो से देश के आजादी की लड़ाई मे निषादों की अग्रणी भूमिका रही है, लोकतंत्र की स्थापना हेतु 06.09.1857 को समाधान निषाद, लोचन निषाद आदि नाविकांे नेे हजारो अग्रेजांे को कानपुर सतीचैरा घाट पर गंगा नदी में डुबोकर मारा था। आजादी की लड़ाई के परिणाम में अंग्रेजों ने क्रूरता का अन्जाम, फांसी, गांव जला एवं उजाड़कर प्रिवि काउंसिल आॅफ लंदन मे अग्रजो ने कू्ररता का अंजाम देते हुए निषादों के जिविकोपार्जन के संसाधन नदी, ताल, घाट, खनिज एवं वन को नार्दन इण्डिया फेरिज़ एक्ट, फिसरिज़ एक्ट, माइनिंग एक्ट, फारेस्ट एक्ट 1878 लागू कर निषादो को उनकी सम्पत्ति से बेदखल कर आदिवासी/जनजाति व दलितोें से भी खराब जीवन जिने व भूखों मरने के लिए मजबूर कर दिया। हमारे पूर्वजो के उपर 12 अक्टूबर 1871 क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट को 1924 में लागू कर निषादो को जरायम/अपराधि जनजाति घोषित कर अधिकारों से वंचित कर दिया। अग्रेजो की इस कू्ररता एवं दण्डात्मक कार्यवाही से बचने के लिए निषाद वंशज मझवार जाति अपनी मूल पहचान बदलकर अलग-अलग पर्यायवाचीजाति केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, धीवर, लोधी, राजगोण्ड, तुरैहा, मांझीं, मछुआ, बाथम, किसान आदि नामों से जाने जानी लगी। उक्त पेशों के छिन जाने के कारण भुखमरी-बेरोजगारी के शिकार हो चुकी है। किसी भी सरकार ने निषादों का अधिकार देने का काम नहीं किया।

आप जानते है कि सुप्रीम कोर्ट ने एकलव्य को दिया इन्साफ मा.सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 5 जनवरी 2011 को भारत के प्रमुख प्रधान न्यायाधीश जस्टिस मार्कण्डेय काटजू एवं ज्ञान सुधा मिश्रा द्वारा निषादों के हक में दिया गया फैसला कहा- द्रोणाचार्य ने शिक्षा दिए बिना अंगूठा लेकर किया घोर अन्याय’’ आदिवासियों को हाशिए पर धकेलने की प्रवृत्ति पर करारी चोट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य को आदिवासी एकलव्य के साथ घोर अन्याय करने का दोषी पाया है।शीर्ष अदालत ने कहा कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या के लिए शिक्षित किए बिना ही उसका अंगूठा गुरू दक्षिणा में ले लिया। गुरु द्रोणाचार्य का यह शर्मनाक काम था। जस्टिस मार्कडेय काटूज और ज्ञान सुधा मिश्रा की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य की छोटी जाति का होने के कारण शिक्षित करने से मना कर दिया था तो उन्हें उससे गुरु दक्षिणा लेने का क्या अधिकार था? उन्होंने उसका अंगूठा भी लिया तो दाहिने हाथ का जिससे वह कभी उनके प्रिय शिष्य अर्जुन की तरह कुशल धनुर्धर न बन सके। यह आदिवासियों के साथ सहशताब्दियों से चले आ रहे अत्याचार का शास्त्राीय उदाहरण है। टिप्पणियां करते हुए खंडपीठ ने महाराष्ट्र में एक भील युवती को निर्वस्त्र कर घुमाने के आरोप में दंडित एक महिला समेत तीन लोगों की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि उन्हें इस बात का आश्चर्य है कि दोषियों को एस.सी/एस.टी एक्ट के तहत दिए गए दंड को हाईकोर्ट ने तकनीकी कारणों से समाप्त कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि आदिवासी ही देश के असली नागरिक है। शेष 92 फीसदी लोग आव्रजक आक्रमणकारियों की संतानें हैं। आज वे सबसे ज्यादा अशिक्षित, भूमिहीन, बीमार तथा कम आयु तक जीवित रहने वाले लोग बन गए है। लेकिन अब जंगलों में भी उन्हें विकास के नाम पर बेदखल किया जा रहा है। साभार- हिन्दुस्तान नई दिल्ली श्याम सुमन राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद एक सशक्त सामाजिक संगठन है जो आजाद देश की सैकड़ो उपजातियों विभक्त निषाद वंश (मछुआ समुदाय) का प्रतिनिधित्व करता है। निषाद वंश का पहला ऐसा संगठन है जिसका एक स्पष्ट ध्येय है। उस सामाजिक एवं राजनैतिक परिवर्तन (ध्येय) को पूरा करने के लिए दृढ़संकल्पित है। अधिकारों से वंचित समाज को एकजुट करने हेतु ग्राम, ब्लाक, तहसील एवं नगर स्तर पर सदस्यता प्रभारी बनाये जायेंगे। यह संगठन आर.एस.एस. एवं बामसेफ जैसा है। चैपाल लगाकर इनको अपने वोट की कीमत एवं शहीदों के ऋण चुकाने का भावना पैदा किया जा रहा है। शासनादेश 606 सी.एम. 31.12.2012 पात्र मझवार के पर्यायवाची जातियों केवट, मल्लाह, माझी आदि को प्रमाण-पत्र देने का निर्देष जारी है। आरक्षण कोई भीख नहीं है हमारा संवैधानिक अधिकार है। अनु.जाति का आरक्षण जबतक नहीं मिलेगा, संघर्ष जारी रहेगा। चाहे हमें जिस स्तर पर भी उतरना पड़े। आज संघर्ष का शंखनाद शुरू हुआ। सरकारे इस गलतफहमी में है कि निषाद एकजुट नही हो सकते है। निषाद समाज डाॅ. संजय के नेतृत्व में संगठित हो चुका है निषादों से ताकत का एहसास कराने और सरकार से अपना अधिकार छीनने की अपील की है। पूरे प्रदेश में समाज का कैडर बेस संगठन तैयार हो गया है, हाथ उठाकर सबने निष्ठापूर्वक डा. संजय जी के नेतृव मे आजीवन चलने का संकल्प लिया है।

आप जानते है कि उपसचिव समाज कल्याण अनुभाग-3 उ.प्र. शासन के शासनादेश संख्या-606सी.एम./26.03.1012 दिनांक 31.12.2012 द्वारा उ.प्र. के समस्त जिलाधिकारियों को ‘‘मझवार’’ जाति के पात्र व्यक्तियो को प्रमाण पत्र जारी करने के आदेश है। उक्त शासनादेश में शासनादेश संख्या-303सी.एम./26.03.2006-3(28)/78 दिनांक 03.02.2007 द्वारा जाति प्रमाण पत्र निर्गत किये जाने के संम्बध में व्यवस्था दी गयी है जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि 1359 फसली के अभिलेख को ही जाति प्रमाण पत्र का आधार न माना जाय अपितु आवेदक के विषय में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए गांव के तथा आस पास के निर्विवाद परिवारों से स्थलिय पूछताछ करके, कुटुम्ब रजिस्टर, शैक्षिक संस्थानों के टी.सी. आदि के आधार पर जाति प्रमाण पत्र निर्गत किए जाय। निदेशक हरिजन तथा समाज कल्याण उ.प्र. ने अपने पत्र द्वारा स्पष्ट किया है कि ‘‘मझवार’’ जाति पूरे प्रदेश में अनुसूचित जाति में शामिल है और प्रमाणित है कि ‘‘मझवार’’ जाति उ.प्र. के सभी मण्डलों एवं जनपदों के तहसीलो में पाई जाती है। मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा अनुसूचित जाति ‘‘मझवार’’ और उसके पर्यायवाची जातिगत नाम को लेकर सि.मि.रि.पि.सं. 42794-2002 दिनांक 03.01.2005 के आदेश में अनुसूचित जाति मझवार के पर्यायवाची जातिगत नाम मल्लाह को विधिसम्मत मानते हुए श्रीमती शशिलता निषाद के पक्ष में निर्णय देते हुए अनुसूचित जाति मझवार के प्रमाण-पत्र को मान्य कर उनकी नौकरी बहाल कर उनके समस्त देय बकायों का भुगतान करने का आदेश दिया। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जारी अनु.जाति की सूची में मझवार जाति 53 न. पर अंकित है और सेन्सस आफ इण्डिया 1961 के अपेण्डिक्स(1)सेन्सस मैनुअल पार्ट (2) उत्तर प्रदेश के अपेण्डिक्स ‘‘एफ’’के क्रमंाक 51 पर अंकित मझवार जाति के पर्यायवाची माझी, मुजाबिर, मल्लाह, केवट, राजगोण्ड, गोण्ड मझवार है बिधिक रूप से उत्तर प्रदेश में निषाद बंश के पर्यायवाची जातियाॅं भारत के संबिधान में उत्तर प्रदेश राज्य हेतु दी गयी अनुसूचित जाति की सूची में शामिल हैं, जो संविधान मे मझवार नाम से अंकित है। आरक्षण की सूची ब्रिटिस हुकुमत के समय 1931 मे बनी थी, उस समय निषादों के उपर जातिगत अपराधी का एफ.आइ.आर.दर्ज था जिसकी सूची कलक्टर के पास रहती थी, अनु.जाति का प्रमाण पत्र कलक्टर ही जारी करता था हमारे समाज के लोग स्वाभिमानी होने के कारण देश की आजादी की लडाई मे सामिल थे निषादों पर जरायम पेशा/क्रिमिनल का एफ.आइ.आर होने से जाति प्रमाण पत्र नही लेने गया। कुछ अग्रजो की सेवादार जातियां एवं समाज द्रोहियों द्वारा अनुसूचित जाति को, जो एक अनुसूची है उसे अछूत जाति की सूची कह कर भ्रम फैलाया। निषाद बंश के अन्दर नीच होने का भाव मन में बैठाया, जिसके कारण अब तक मझवार जाति का प्रमाण पत्र बनवाने ही नहीं गया। तदोपरान्त सामाजिक एवं ऐतिहासिक ज्ञान के आभाव मे तथा सत्तासीन राजनैतिक दलों के बहकावे से कि केवट, मल्लाह, मांझी आदि को अनुसूचित जाति की सूची मे शामिल कर देगें से प्रेरित होने के कारण अब तक मझवार की प्रयायवाची/उपजातियां अनुसूचित जाति का लाभ नहीं ले सके इस पूर्वाग्रह से अधिकारी एवं कर्मचारी भी भ्रमित है। उपरोक्त उपजातियो को केन्द्र सरकार दो तिहाई बहुमत से संसोधन बिल पारित कराकर संविधान की सूची मे सामिल किया जा सकता है जो असंभव है और असवैधनिक भी है क्योकि उपरोक्त पर्यायवाची जातियां की मूल जाति मझवार अनुसूचित जाति की सूची मे पहले से ही मौजूद है।

आप जानते है कि सेंन्सस आफ इण्डिया 1961 के अपेन्डिक्स(1)सेन्सस मैनुअल पार्ट(2)उत्तर प्रदेश के अपेन्डिक्स ‘एफ’ को आधार मानकर मोंची, अहिरवार, रवीदास, जाटव, कुरील, उत्तरहा, दखिनहा, रैदास को चमार का,,मेहतर, जमादार को वाल्मिकी का, पथरकट्ट को दबगर का, रजक, कनौजिया, बरेठा को धोबी का, लोनिया को बेलदार का अनु.जाति का लाभ एवं प्रमाण-पत्र मिल रहा है।राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद् जिलाधिकारी गोरखपुर को 5 मई 2013 को आवेदन किया गया था कि तहसीलो में मझवार के प्रर्यायवाची जातियों के आवेदन पर उनको मझवार अनु.जाति का प्रमाण-पत्र जारी हों। डी.एम. ने ए.डी.एम.(सीटी) एवं ए.डी.एम.(वि./रा.) की संयुक्त जांच आख्या के आघार पर सभी एस.डी.एम. एवं तहसीलदारो को मझवार अनु.जाति पमाण-पत्र जारी करने का निर्देश दिया है। मझवार के पर्यायवाची जातियों केवट, मल्लाह, मांझी आदि को तहसीलों में प्रमाण पत्र हेतु आवेदन प्रस्तुत करने पर तहसीलो के अधिकारियों द्वारा तरह-तरह का बहाना बनाकर प्रार्थना पत्र को निरस्त कर प्रमाण-पत्र नहीं दिया जा रहा था। जो 31.12.2012 के शासनादेश एवं संविधान का खुला उल्लंघन था। आप सभी लोगांे द्वारा गोरखपुर मे 1 फरवरी से 10 फरवरी 2014 तक धरना-प्रदर्शन चलाने के बाद जिलाधिकारी महोदय जी ने 11 फरवरी 2014 को अनुसूचित जाति की सूची क्रमांक 53 पर अंकित मझवार के पर्यायवाची जातियंा केवट, मल्लाह, मांझी आदि को अनु.जाति का प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश सभी तहसीलदारों को दिया है लेकिन प्रमाण-पत्र आसानी से नहीं दिया जा रहा है। आप भी तहसीलों में मझवार जाति के लिए आवेदन कर अनु.जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करें जो संबैधानिक रूप से न्याय संगत। इसी प्रकार का आदेश पूरे प्रदेश में लागू कराने के लिए 17 फरवरी 2014 को लखनउ में मुख्यमन्त्री के आवास पर प्रदर्शन के दौरान निषाद वंशियों पर लाठी चार्ज कर सैकड़ों को घायल कर आप निषादों के पर्यायवाची जातियों को मझवार अनु.जाति का आरक्षण न देने का कुचक्र सरकार ने किया। विधान सभा सत्र में किसी भी पार्टी नें हम निषादों के साथ हो रहे अत्याचार, अन्याय के विरूद्ध एवं आरक्षण के मुददे को नही उठाया। सभी पार्टीयांे के मिलीभगत से हमारे समाज कोे बर्वाद किया जा रहा है। मझवार की सभी पर्यायवाची जातियों को केन्द्र द्वारा 7.5 प्रतिशत विमुक्ति जनजाति एवं राज्य द्वारा सभी लाभकारी परियोजनाओं में 7.5 प्रतिशत अनुमन्य आवश्यक लाभ देने हेतु सभी सम्बन्धित विभागों को 3 मार्च 2014 को शासन द्वारा शसनादेश जारी किया गया है।जो अबतक नहीं मिला। यदि हम सब मिलकर आरक्षण की लड़ाई नही लड़े तो बर्वाद हो जायंेगे।

आप जानते है कि अंग्रेंजो की कू्ररता एवं दण्डात्मक कार्यवाही से बचने के लिए निषाद वंश ‘मझवार’ जाति अपनी मूल पहचान बदलकर अलग-अलग पर्यायवाची जाति केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, धीवर, लोधी, राजगोण्ड, तुरैहा, माझीं, मछुआ, बाथम, किसान, वर्मा, पटेल, लोध, गोण्ड मझवार, मुजाबिर, अवधिया, महार, कहार, धिमर, धिवर, खरवार, खैरवार, गोडि़या, गारिया, गुरिया, झीमर, झीमवार, झीर, झिवर, रैकवार, केउट, तुरहा, तुराहा, सोरहिया, खुलवट, चांई, बेलदार, मछ्वा, मल्हर, मल्हार, मछुआ, मच्छावा, मंड¨रा, मछीदा, मछावा, मछीमार, मुंडास, मछेद्रा, मालाकार, मुलाया, मुलन्दा, मुकाया, मुक्कूर्क, मुन्दीराजा, मनिगरा, मेवारी, म¨गेरा, मीन, मीनूगारा, माली, बर्मन, बरमैया, बरचाई, बाधव, बरिकार, बगवारी, बड़े, बारी, बन्स्था, ब¨ई, बैगा, ब©दी, भ¨ई, भीमर, ढीमर, झींगर, झरी, कदमा, कार, कव्वर, कब्बेश, केड्त, कब्बलिंगा, किरात, क¨ली, क¨ल्वा, क¨लमा, क¨रवा, क¨तल, कर्ताधार, कीर, क¨ची, केबर्ता, केवटी, कर्वत, त¨रिया, तुरहा, तुरैया, तुराई, तुगये, तन्हेल, त¨मर, रैकवार, रायकवार, राजद्वार, जूलगेरा, जलक्षत्रिय, स¨ंधिया, सिंधिया, सिंगरहा, सिविन्यार, सफालिंगा, सुनामारा, सरदिया, संभा, सीवर, साल¨, बराऊ, बड़ावतीला, वन्नेकपू, बड्डी, वेस्था, बर्वे, वन्नारेड्डू, वन्याफुला, क्षत्रीय, हरिकंभरा, खरवार, खादीभ¨ई, खरवी, खेरवार, खागी, आर्य, आम्बिगा, आग्ने, लाक्षत्रीय, ट¨करेचाई, पल्लीरेड्डी, पल्लीकापू, पल्ली, पटती, पट्न¨, पवेहा, पवैया, डेवर, धुरिया, धेवर, धेवरा, ध¨रेवा, दुले, नंदा, नन्दाने, नदेहा, नादिया, नंदानिया, नवाडी, नरयल, न¨रिया, नायक, नाविक, निषाद, नायकारा, नालेफेरा, नामदास, नामयुद्ध, नीरागंती, गंगापुत्र, गंगवार, गंगाफुला, गाधर, गरिया, गूंडला, ग¨ंड, ग¨ंडराज, ग¨रीमाथा, गुरिया, गंगेयकाल, गुर्री, ग¨न्ति, ग©र, खदीभ¨ई, खरवी, खागी, जावरे, खेदकर, कश्जोक्ज, शिवदे मोर, लम्बोल डोले आदि नाम हो गयी।

अब निषाद वशं के विभिन्न जातियों/उपजातियों मे बटे लोग अपना खोया हुआ राज-पाट, अधिकार, मान-सम्मान, स्वाभिमान वापस लाना चाहते है, जानकार होशियार समझदार मतदाता/राजनीतिक बनना चाहते हंै। सभी बन्धुओं, बहनों से अनुरोध है कि राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद् अपने परम पूज्यनीय भगवानों के भगवान महाराजा गुह्यराज निषाद के जन्म स्थल राजधानी श्रृग्वेरपुर धाम, इलाहबाद मंे शपथ एवं संकल्प लेकर निकले राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद् के समर्पित कार्यकर्ताओं/प्रशिक्षकों द्वारा संगठनात्मक कैडर मिटिंग के प्रबोधन, प्रशिक्षण के आयोजन में निषाद राजाओं के विचारधारा एवं क्रंातिकारी शहिदों के गौरवशाली इतिहास, राज-पाट पाने के लिए समाजिक एवं राजनितिक सोच के हितचिंतकों, बुद्धजीवीयों से अनुरोध है कि जागृति एवं जगरूकता के अभियान में सक्रिय सहभागिता के लिए अमूल्य समय, बुद्धि, हुनर, श्रम के साथ, सहयोग देकर मान, सम्मान, स्वाभिमान एवं विरासत प्राप्ति हेतु कृत्य संकल्प एवं धन्य होवें। सत्ता से वंचित,राजनिति से बहिस्कृत निषाद समुदाय के हाथों में सत्ता की मास्टर चाभी अवस्य होगी। इसके लिए राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद् दृढ़ संकल्पित है।

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